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गुलज़ार की नज़्म
वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर,
आदत इस की भी आदमी सी है।
हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते,
वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं टूटा करते। 🍃
आदत इस की भी आदमी सी है।
हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते,
वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं टूटा करते। 🍃